Kesari (film) [ केसरी : सारागढ़ी का संग्राम ]

Kesari (film)  [  केसरी : सारागढ़ी का संग्राम  ]



1897 में अफगानों द्वारा एक विद्रोह शुरू हुआ और 27 अगस्त से 11 सितंबर के बीच पश्तूनों द्वारा किलों को कब्ज़ा करने के कई जोरदार प्रयासों को ब्रिटिश सेना की 36वीं रेजिमेंट जो अब सिख रेजीमेंट के नाम से जानी जाती है द्वारा विफल कर दिया गया। 1897 में विद्रोह और आकस्मिक गतिविधियां बढ़ गई थीं और 3 तथा 9 सितंबर को अफरीदी आदिवासियों ने अफगानों के साथ मिल करके फोर्ट गुलिस्तान पर हमला किया। दोनों हमलों को नाकाम कर दिया गया था। पश्तूनों और अफगानों नेतृत्व गुल बादशाह कर रहा था।
12 सितम्बर 1897 को ब्रिटिश भारतीय सेना और अफ़्ग़ान कबिलाइयों (ओराक्ज़ई जनजातियों) के मध्य तिराह अभियान से पहले लड़ा गया। यह उत्तर-पश्चिम फ्रण्टियर प्रान्त (वर्तमान खैबर-पखतुन्खवा, पाकिस्तान में) में संग्राम हुआ।

credit : kesari film



ब्रिटिश  भारतीय सैन्यदल में ३६ सिख (सिख रेजिमेंट की चौथी बटालियन) के २१ सिख थे, जिन पर १२,००० अफ़्ग़ानों ने हमला कर किया। सिखों का नेतृत्व कर रहे हवलदार ईशर सिंह ने मृत्यु पर्यन्त युद्ध करने का निर्णय लिया। इसे सैन्य इतिहास में इतिहास के सबसे महान  युद्धों में से एक माना जाता है। 






सारागढ़ी समाना रेंज पर स्थित कोहाट जिले का सीमावर्ती इलाके का एक छोटा सा गाँव है और इस समय वर्तमान पाकिस्तान में है । इस किले को 21 अप्रैल 1894 को ब्रिटिश भारतीय सेना के 36वीं सिख रेजिमेंट के कर्नल जे कुक की कमान में बनाया गया था।  अगस्त 1897 में लेफ्टिनेंट कर्नल जॉन हैटन की कमान में 36वीं सिख रेजिमेंट की पांच कंपनियों को ब्रिटिश-इंडिया (वर्तमान में खैबर पख्तूनख्वा) के उत्तरपश्चिमी सीमा पर भेजा गया था और समाना हिल्स, कुराग, संगर, सहटॉप धर और सारागढ़ी में उनकी तैनाती की गई।

ब्रिटिश इस अस्थिर और अशांत क्षेत्र पर नियंत्रण पाने में आंशिक रूप से तो सफल रहे, लेकिन वहाँ के मूल निवासी पश्तूनों ने समय-समय पर ब्रिटिश सैनिकों पर हमला करना जारी रखा। इस लिए ब्रिटिश राज ने किलों की एक श्रृंखला को मरम्मत करके अपनी स्थिति मजबूत करनी चाही , ये वो किले थे जो मूल रूप से सिख साम्राज्य के शासक महाराजा रंजीत सिंह द्वारा बनाए गए थे। इनमें से दो किले फोर्ट लॉकहार्ट (हिंदू कुश पहाड़ों की समाना रेंज पर) और फोर्ट गुलिस्तान (सुलेमान रेंज) ऐसे थे जो एक-दूसरे से कुछ मील की दूरी पर स्थित थे। इन किलों को एक-दूसरे से दिखाई नहीं देने के कारण सारागढ़ी को इन किलों के मध्य में बनाया गया था और इसका प्रयोग एक हेलिओोग्राफ़िक संचार पोस्ट के रूप में किया जाने लगा। सारागढ़ी पोस्ट को एक चट्टानी पहाड़ी की चोटी पर बनाया गया, जिसमें एक छोटा सा ब्लॉक हाउस, किले की दीवार और एक सिग्नलिंग टॉवर का निर्माण किया गया










सारागढ़ी की लड़ाई के विवरण को काफी सटीक माना जाता है, क्योंकि सिपाही गुरमुख सिंह ने युद्ध के दौरान फोर्ट लॉकहार्ट को हेलियोग्राफ़ संकेतों के रूप में किले में होने वाली घटनाओं का संकेत दिया था।
सारगढ़ी युद्ध का विस्तृत जानकारी , गुरमुख सिंह हेलीकॉफ से फोर्ट लॉकहार्ट की संकेतों के अनुसार यथार्थता से ज्ञात माना जाता है।1897 में अफगानों द्वारा एक विद्रोह शुरू हुआ और 27 अगस्त से 11 सितंबर के बीच पश्तूनों द्वारा किलों को कब्ज़ा करने के कई जोरदार प्रयासों को ब्रिटिश सेना की 36वीं रेजिमेंट जो अब सिख रेजीमेंट के नाम से जानी जाती है द्वारा विफल कर दिया गया। 1897 में विद्रोह और आकस्मिक गतिविधियां बढ़ गई थीं और 3 तथा 9 सितंबर को अफरीदी आदिवासियों ने अफगानों के साथ मिल करके फोर्ट गुलिस्तान पर हमला किया। दोनों हमलों को नाकाम कर दिया गया था। पश्तूनों और अफगानों नेतृत्व गुल बादशाह कर रहा था।
१२ सितम्बर १८९७ को ब्रिटिश भारतीय सेना और अफ़्ग़ान कबिलाइयों (ओराक्ज़ई जनजातियों) के मध्य तिराह अभियान से पहले लड़ा गया। यह उत्तर-पश्चिम फ्रण्टियर प्रान्त (वर्तमान खैबर-पखतुन्खवा, पाकिस्तान में) में संग्राम हुआ।
ब्रिटिश  भारतीय सैन्यदल में ३६ सिख (सिख रेजिमेंट की चौथी बटालियन) के २१ सिख थे, जिन पर १२,००० अफ़्ग़ानों ने हमला कर किया। सिखों का नेतृत्व कर रहे हवलदार ईशर सिंह ने मृत्यु पर्यन्त युद्ध करने का निर्णय लिया। इसे सैन्य इतिहास में इतिहास के सबसे महान  युद्धों में से एक माना जाता है।

सारागढ़ी समाना रेंज पर स्थित कोहाट जिले का सीमावर्ती इलाके का एक छोटा सा गाँव है और इस समय वर्तमान पाकिस्तान में है । इस किले को 21 अप्रैल 1894 को ब्रिटिश भारतीय सेना के 36वीं सिख रेजिमेंट के कर्नल जे कुक की कमान में बनाया गया था।  अगस्त 1897 में लेफ्टिनेंट कर्नल जॉन हैटन की कमान में 36वीं सिख रेजिमेंट की पांच कंपनियों को ब्रिटिश-इंडिया (वर्तमान में खैबर पख्तूनख्वा) के उत्तरपश्चिमी सीमा पर भेजा गया था और समाना हिल्स, कुराग, संगर, सहटॉप धर और सारागढ़ी में उनकी तैनाती की गई।

ब्रिटिश इस अस्थिर और अशांत क्षेत्र पर नियंत्रण पाने में आंशिक रूप से तो सफल रहे, लेकिन वहाँ के मूल निवासी पश्तूनों ने समय-समय पर ब्रिटिश सैनिकों पर हमला करना जारी रखा। इस लिए ब्रिटिश राज ने किलों की एक श्रृंखला को मरम्मत करके अपनी स्थिति मजबूत करनी चाही , ये वो किले थे जो मूल रूप से सिख साम्राज्य के शासक महाराजा रंजीत सिंह द्वारा बनाए गए थे। इनमें से दो किले फोर्ट लॉकहार्ट (हिंदू कुश पहाड़ों की समाना रेंज पर) और फोर्ट गुलिस्तान (सुलेमान रेंज) ऐसे थे जो एक-दूसरे से कुछ मील की दूरी पर स्थित थे। इन किलों को एक-दूसरे से दिखाई नहीं देने के कारण सारागढ़ी को इन किलों के मध्य में बनाया गया था और इसका प्रयोग एक हेलिओोग्राफ़िक संचार पोस्ट के रूप में किया जाने लगा। सारागढ़ी पोस्ट को एक चट्टानी पहाड़ी की चोटी पर बनाया गया, जिसमें एक छोटा सा ब्लॉक हाउस, किले की दीवार और एक सिग्नलिंग टॉवर का निर्माण किया गया सारागढ़ी की लड़ाई के विवरण को काफी सटीक माना जाता है, क्योंकि सिपाही गुरमुख सिंह ने युद्ध के दौरान फोर्ट लॉकहार्ट को हेलियोग्राफ़ संकेतों के रूप में किले में होने वाली घटनाओं का संकेत दिया था। सारगढ़ी युद्ध का विस्तृत जानकारी , गुरमुख सिंह हेलीकॉफ से फोर्ट लॉकहार्ट की संकेतों के अनुसार यथार्थता से ज्ञात माना जाता है।

सुबह ९:०० के लगभग, लगभग १०,००० अफ़्ग़ान सारागढ़ी पोस्ट पर पहुँचने का संकेत दिया।
गुरमुख सिंह के अनुसार लोकहार्ट किले में कर्नल हौथटन को सूचना मिली की उन पर हमला हुआ है।
कर्नल हौथटन के अनुसार सारागढ़ी में तुरन्त सहायता भेजने में अशमर्थ थे । २१ सैनिकों ने अन्तिम साँस तक लड़ने का निर्णय लिया। भगवान सिंह सबसे पहले घायल हुये और लाल सिंह गम्भीर रूप से घायल हुये। सैनिक लाल सिंह और जिवा सिंह कथित तौर पर भगवान सिंह के शरीर को पोस्ट के अन्दर लेकर आये। दुश्मनों ने घेरे की दीवार के एक भाग को तोड़ दिया। कर्नल हौथटन ने संकेत दिया कि उसके अनुमानों के अनुसार सारगढ़ी पर १०,००० से १४,००० पश्तों ने हमला किया है। अफ़्ग़ान सेना के अधिनायक सैनिकों को आत्मसमर्पण करने के लिए लुभाता रहा। कथित तौर पर मुख्य द्वार को खोलने के लिए दो बार प्रयास किया गया लेकिन असफल रहे। उसके बाद दीवार टूट गयी। उसके बाद आमने-सामने की भयंकर संग्राम हुई।

असाधारण बहादुरी दिखाते हुये ईशर सिंह ने अपने सैनिकों को पीछे की तरफ हटने का आदेश दिया जिससे लड़ाई को जारी रखा जा सके। हालाँकि इसमें बाकी सभी सैनिक अन्दर की तरफ चले गये लेकिन एक पश्तों के साथ एक सैनिक मारा गया। गुरमुख सिंह, जो कर्नल हौथटन को साथ युद्ध समाचारों से अवगत करवा रहे थे, अन्तिम सिख रक्षक थे। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने २० अफ़्ग़ान सैनिकों को मारा, पश्तों ने उसको मारने के लिए आग के गोलों से हमला किया। उन्होंने मरते दम तक लगातार "जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल" बोलते रहे। सारगढ़ी को तबाह करने के पश्चात अफ़्ग़ानों ने गुलिस्तां किले पर निगाहें डाली, लेकिन इसमें उन्होंने काफी देरी कर दी और १३-१४ सितम्बर की रात्रि में अतिरिक्त सेना वहाँ पहुँच गयी और किले पर युद्ध के दो दिन बाद अन्य ब्रिटिश इंडिया सेना द्वारा  पुनः अधिकार प्राप्त किया गया।। इसके बाद पश्तूनों  ने स्वीकार किया कि २१ सिखों के साथ युद्ध में उनके २०० से अधिक सैनिक मारे गये और बहुत से सैनिक घायल हुये लेकिन बचाव दल के वहाँ पहुँचने पर तबाह जगह पर वहाँ ६०० से अधिक  शव मिले।(हालाँकि १४ सितम्बर को बड़ी मात्रा में तोपखानों से आग लगाकर किले पर पुनः कब्जा कर लिया, जिसके कारण जनहानि हो सकती है)। इस युद्ध में कुल ४,८०० लोग मारे गये।

सिख सैन्य कर्मियों द्वारा इस युद्ध की याद में १२ सितम्बर को सारगढ़ी दिवस के रूप में मनाते हैं।





सारागढ़ी दिवस



सारागढ़ी दिवस एक सिख सैन्य स्मारक दिवस है जो हर साल 12 सितंबर को सारागढ़ी की लड़ाई की याद में मनाया जाता है। सिख सैन्यकर्मी और नागरिक 12 सितंबर को हर साल दुनिया भर में लड़ाई की याद करते हैं। सिख रेजिमेंट की सभी टुकड़ियां हर साल सारागढ़ी दिवस को रेजिमेंटल बैटल ऑनर्स डे के रूप में मनाती हैं। विदेशों में भी भारतियों खासकर सिखों द्वारा सारागढ़ी दिवस बड़े गर्व से मनाया जाता है

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